जब अचरेकर सर के एक तमाचे ने सचिन को बदल डाला

सचिन तेंदुलकर ने जब दिसंबर, 2013 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया था तो मैच के बाद अपने संबोधन में उन्होंने कोच रमाकांत अचरेकर को कुछ यूं याद किया था, "11 साल का था, तब मेरा करियर शुरू हुआ था. मैं अचरेकर सर को स्टैंड में देखकर बहुत खुश हूं. मैं उनके स्कूटर पर बैठकर दिन में दो मैच खेलने जाता था."

"सर मुझे स्कूटर में ले जाते थे ताकि मैं मैच मिस नहीं कर सकूं. आज जब माहौल थोड़ा हल्का है तो मैं बताना चाहता हूं सर ने मुझे कभी नहीं कहा- वेल प्लेड, क्योंकि वे कभी नहीं चाहते थे कि मैं थोड़ा भी लापरवाह हो जाऊं. लेकिन सर अब आप ऐसा कह सकते हैं क्योंकि मैं अब क्रिकेट नहीं खेल रहा हूं."

200 टेस्ट और 463 वनडे में क़रीब 35 हज़ार रन और सौ शतक जमाने वाले क्रिकेटर की इन बातों से शायद आपको अंदाज़ा हो रहा होगा कि रमाकांत अचरेकर क्या आदमी रहे होंगे. लेकिन अंदाज़ा लगाने से पहले उस दौरान रमाकांत अचरेकर क्या कर रहे थे, ये जान लीजिए.

तब रमाकांत अचरेकर बीमार थे और कुछ सालों से टीवी पर भी क्रिकेट नहीं देख पा रहे थे. टीवी सेट के सामने भी वे नहीं बैठ पाते थे. बोलने में तकलीफ़ थी. लेकिन घर वालों को मालूम था कि मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में सचिन जब आख़िरी बार टेस्ट खेलने उतरेंगे तो ये अचरेकर के लिए बहुत भावुक पल होने वाला है, लिहाजा उनकी बेटी कल्पना मुरकर को ये मालूम था कि पिता जी को स्टेडियम लेकर जाना ही होगा.

सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट के मैदान पर देखने के लिए अचरेकर पहली बार स्टेडियम में गए थे. वह भी तब, जब वे उनके संन्यास के फ़ैसले से नाराज़ थे. उन्होंने तब मुझसे फ़ोन पर हुई बातचीत में कहा था, धक्का लगा. अचरेकर की बेटी के मुताबिक पिताजी को लगता था कि सचिन तेंदुलकर अभी कुछ साल और खेल सकते थे.

बहरहाल, बात उस मुलाक़ात की, जिसके कारण क्रिकेट के आसमान पर सचिन तेंदुलकर जैसा सितारा छा गया. ये मुलाक़ात हुई थी रमाकांत अचरेकर और 11 साल के सचिन तेंदुलकर की. इस मुलाकात का ख़ूबसूरत ज़िक्र सचिन तेंदुलकर ने अपनी आत्मकथा 'प्लेइंग इट माय वे' में किया है.

उन्होंने लिखा है कि उनके भाई अजीत तेंदुलकर उन्हें अचरेकर सर के पास शिवाजी पार्क में ले गए थे, जहां अंडर-15 समर कैंप के लिए ट्रायल लगा हुआ था. कोई भी बच्चा नेट्स पर प्रैक्टिस कर सकता था, जिसे देखने के बाद ही अचरेकर तय करते थे कि उस बच्चे को कैंप में लेना है या नहीं.

सचिन ने अपने अनुभव के बारे में लिखा है, "मैंने इससे पहले नेट्स में कभी बल्लेबाज़ी नहीं की थी. आस-पास बहुत सारे लोग भी जमा थे. जब मुझे बल्लेबाज़ी करने को कहा गया तब मैं बिलकुल कंफर्टेबल नहीं था. सर बहुत गंभीरता से देख रहे थे और मैं कोई प्रभाव नहीं डाल पाया था. मेरी बल्लेबाज़ी ख़त्म होने के बाद सर ने अजीत को बगल में बुलाकर कहा था मैं कैंप के लिए बहुत छोटा हूं, मुझे बाद में लेकर आना चाहिए."

सचिन ने ये भी लिखा है कि इस बातचीत में वे शामिल नहीं थे लेकिन उनकी उम्मीद ख़त्म होने वाली थी. मगर अजीत को उनपर भरोसा था.

अजीत अचरेकर सर को ये समझाने में कामयाब रहे है कि सचिन नर्वस हो चुका है, आप ऐसा कीजिए कि दूर से उसे बल्लेबाज़ी करते हुए देखिए. अचरेकर मान गए और फिर वो सिलसिला चल निकला, जिसके बाद महज पांच साल के अंदर सचिन भारतीय टीम में पहुंच गए.

रमाकांत अचरेकर ने शुरुआती दिनों में ही सचिन को घंटों नेट्स पर पसीना बहाना सिखाया, जिसे सचिन पूरे करियर में अपनाते दिखे. ये भी दिलचस्प है कि कोचिंग के दिनों में रमाकांत अचरेकर ने एक नियम लागू किया था- सचिन तेंदुलकर को अभ्यास में आउट करने वाले गेंदबाज़ों को इनाम वह एक सिक्का देंगे तो सचिन ने तय कर लिया कि यह सिक्का दूसरों के पास भला क्यों जाए.

इस नियम का दूसरा रूप यह था कि सचिन अगर दिन भर किसी भी गेंदबाज़ से आउट नहीं होते तो वह सिक्का सचिन को मिलता. रमाकांत अचरेकर से सचिन तेंदुलकर ने एक-एक करके कुल 13 सिक्के हासिल किए जिन्हें उन्होंने आज भी बेहद संभाल कर रखा हुआ है. सचिन के मुताबिक़ ये उनके लिए बेशकीमती इनाम से कम नहीं हैं.

सचिन तेंदुलकर को तराशने से करीब दो दशक पहले पहले रमाकांत अचरेकर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के कर्मचारी हुआ करते थे. घर में क्रिकेट का माहौल था, क्योंकि उनके पिता, विजय मांजरेकर के दादाजी के साथ न्यू हिंद क्लब की ओर से क्रिकेट खेलते थे.

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